प्रसंग (Context)
हाल ही में भारतीय कॉर्पोरेट क्षेत्र में दो बड़ी उपलब्धियां देखी गईं— रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) 10 अरब डॉलर से अधिक का वार्षिक लाभ अर्जित करने वाली पहली भारतीय कंपनी बनी, और अमूल (Amul) 1 लाख करोड़ रुपये (1 ट्रिलियन) का कारोबार करने वाली भारत की पहली एफएमसीजी (FMCG) कंपनी बन गई। इन ऐतिहासिक सफलताओं के बावजूद, आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय कंपनियां अभी भी वैश्विक स्तर पर प्रभुत्वशाली, नवाचार-संचालित और वैश्विक अर्थव्यवस्था के उच्च-लाभ वाले (High-Profit Pool) क्षेत्रों (जैसे सेमीकंडक्टर, एआई, और डीप-टेक) में अग्रणी स्थान हासिल नहीं कर पाई हैं। इसने देश में स्टार्ट-अप्स को केवल यूनिकॉर्न बनाने के बजाय उन्हें 'वैश्विक कॉर्पोरेट दिग्गज' (Global Corporate Champions) के रूप में विकसित करने की आवश्यकता पर एक नई बहस को जन्म दिया है।
भारतीय स्टार्ट-अप इकोसिस्टम की वर्तमान स्थिति
उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) के हालिया आंकड़ों के अनुसार, 'स्टार्टअप इंडिया' (Startup India) पहल के तहत देश में 1.6 lakh से अधिक स्टार्ट-अप्स को मान्यता दी जा चुकी है। भारत वर्तमान में अमेरिका और चीन के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्ट-अप इकोसिस्टम बन चुका है। देश में 100 से अधिक 'यूनिकॉर्न' (Unicorns - 1 अरब डॉलर से अधिक मूल्यांकन वाले स्टार्ट-अप) विकसित हो चुके हैं। भारत ने फिनटेक (Fintech), एडटेक (Edtech), ई-कॉमर्स, सास (SaaS), हेल्थ-टेक और हाल के वर्षों में डीप-टेक (Deep-tech) जैसे क्षेत्रों में असाधारण वृद्धि दर्ज की है। हालांकि, संख्यात्मक रूप से विशाल होने के बावजूद, वैश्विक स्तर पर बहुराष्ट्रीय दिग्गजों (MNC Giants) के साथ सीधी प्रतिस्पर्धा करने वाली कंपनियों की संख्या बेहद कम है।
वैश्विक तुलना: भारत बनाम अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ
भारत और अन्य विकसित देशों के बीच कॉर्पोरेट संरचना और नवाचार व्यय में स्पष्ट अंतर देखा जा सकता है:
- वैश्विक कॉर्पोरेट दिग्गज (Corporate Giants): भारत में चुनिंदा पारंपरिक दिग्गजों को छोड़कर तकनीकी क्षेत्र में वैश्विक प्रभुत्व रखने वाली कंपनियों (जैसे एप्पल, माइक्रोसॉफ्ट, एनवीडिया) का अभाव है। इसके विपरीत, अमेरिका में वैश्विक ब्रांड्स की भरमार है, चीन में अलीबाबा, टेनसेंट और BYD जैसे दिग्गज हैं, तथा दक्षिण कोरिया में सैमसंग और एसके हाइनिक्स (SK Hynix) जैसी स्थापित कंपनियां हैं।
- अनुसंधान एवं विकास (R&D) व्यय (GDP का %): भारत अनुसंधान और विकास पर अपनी जीडीपी का 1% से भी कम (लगभग 0.64%) खर्च करता है। इसके विपरीत, यूएसए (~3.5%), चीन (~2.5%), और दक्षिण कोरिया (~5%) अनुसंधान पर भारी निवेश करते हैं।
- उच्च-लाभ वाली तकनीकी कंपनियां: वैश्विक स्तर पर सर्वाधिक मुनाफे वाले प्रौद्योगिकी बाजारों (सेमीकंडक्टर, प्रोपराइटी सॉफ्टवेयर, फार्मास्यूटिकल पेटेंट) पर पश्चिमी देशों और पूर्वी एशियाई दिग्गजों का कब्जा है, जबकि भारतीय आईटी क्षेत्र मुख्यतः कम मार्जिन वाले सेवा-आधारित (Service-based) मॉडल पर निर्भर है।
- घरेलू बनाम विदेशी बाजार निर्भरता: अमेरिकी और चीनी दिग्गजों के विपरीत, अधिकांश भारतीय स्टार्ट-अप्स मुख्य रूप से भारत के घरेलू उपभोक्ता बाजार पर ही निर्भर हैं। वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेटेंट या वैश्विक ब्रांड के माध्यम से मूल्य (Value Capture) अर्जित करने में पीछे रह जाते हैं।
भारतीय स्टार्ट-अप क्षेत्र की प्रमुख चुनौतियाँ और सीमाएँ
- अधिकता की समस्या (Problem of Plenty): भारत में स्टार्ट-अप्स की कुल संख्या बहुत अधिक है, लेकिन उनमें से 90% से अधिक कंपनियां बहुत छोटी बनी रहती हैं और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पाती हैं। संख्यात्मक वृद्धि के बावजूद उनका पैमाना (Scale) और प्रभाव काफी सीमित है।
- घरेलू बाजार की ओर अत्यधिक झुकाव: भारतीय उद्यमी देश के विशाल और बढ़ते मध्यम वर्ग को लक्षित करते हैं। घरेलू बाजार बड़ा होने के बावजूद, क्रय शक्ति (Purchasing Power) कम होने के कारण कुल लाभ पूल (Profit Pool) छोटा रह जाता है, जिससे उनकी अंतरराष्ट्रीय बाजार हिस्सेदारी और मूल्य निर्धारण क्षमता (Pricing Power) सीमित हो जाती है।
- उच्च-लाभ और गहन प्रौद्योगिकी क्षेत्रों का अभाव: सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), उन्नत विनिर्माण (Advanced Manufacturing) and जैव प्रौद्योगिकी जैसे गहन अनुसंधान-आधारित क्षेत्रों में भारतीय कंपनियों की उपस्थिति नगण्य है। अधिकांश वैश्विक मुनाफे का हिस्सा इन क्षेत्रों के दिग्गजों को मिलता है।
- अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर नाममात्र व्यय: भारत का निजी और सार्वजनिक R&D व्यय जीडीपी के 1% से भी नीचे अटका हुआ है, जिसके कारण हम बुनियादी अनुसंधान में पीछे रह जाते हैं और विदेशी प्रौद्योगिकियों के केवल असेंबलर या सर्विस प्रोवाइडर बने रहते हैं।
- धैर्यपूर्ण पूंजी (Patient Capital) का अभाव: गहरे नवाचारों (Deep-tech Innovations) को व्यावसायिक रूप से सफल होने में 10 से 15 साल का समय लग सकता है। भारत में अधिकांश वेंचर कैपिटल (Venture Capital) त्वरित मुनाफे और उपभोक्ता-केंद्रित ऐप्स पर केंद्रित रहता है, जिससे मौलिक नवाचार को दीर्घकालिक वित्त नहीं मिल पाता।

भारत को स्टार्ट-अप नहीं, बल्कि स्केल-अप की आवश्यकता क्यों है?
केवल नए स्टार्ट-अप शुरू करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका बड़े कॉरपोरेट दिग्गजों में बदलना निम्नलिखित कारणों से देश के लिए अनिवार्य है:
- उत्पादकता में सुधार (Productivity): बड़ी कंपनियां अपनी स्थापित अवसंरचना के कारण अनुसंधान, प्रौद्योगिकी और अनुपालन की स्थिर लागतों (Fixed Costs) को अधिक उत्पादन मात्रा पर विभाजित कर देती हैं। इससे प्रति इकाई लागत में कमी (Economies of Scale) आती है और उत्पादकता बढ़ती है।
- नवाचार का नेतृत्व (Innovation): क्रांतिकारी और टिकाऊ नवाचारों के लिए भारी जोखिम उठाने की क्षमता, कुशल श्रम बल और दीर्घकालिक R&D निवेश की आवश्यकता होती है। यह क्षमता केवल स्थापित और आर्थिक रूप से सुदृढ़ बड़ी स्केल-अप कंपनियों के पास ही होती है।
- वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता और मूल्य निर्धारण शक्ति: वैश्विक बाजार में वर्चस्व रखने वाले दिग्गजों के पास मजबूत वैश्विक ब्रांड, अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक संपदा (IP) और क्रॉस-बॉर्डर सप्लाई चेन नेटवर्क होता. ये कंपनियां वैश्विक व्यापार में भारत के प्रभुत्व को बढ़ाती हैं।
- रोजगार का बड़े पैमाने पर सृजन: उच्च राजस्व वाली बड़ी कंपनियां न केवल सीधे रोजगार देती हैं, बल्कि अपने साथ एक व्यापक आपूर्तिकर्ता परितंत्र (Supplier Ecosystem), रसद और सहायक उद्योगों का भी विकास करती हैं, जिससे लाखों लोगों को परोक्ष रोजगार मिलता है।
- राजकोषीय और सामाजिक प्रभाव (Fiscal Impact): अत्यधिक लाभ कमाने वाली बड़ी कंपनियां कॉरपोरेट कर और अप्रत्यक्ष करों के माध्यम से सरकारी खजाने में सबसे बड़ा योगदान देती हैं। इससे सरकार की स्वास्थ्य, शिक्षा और कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च करने की वित्तीय क्षमता मजबूत होती है।
- रणनीतिक और प्रौद्योगिकीय संप्रभुता (Strategic Sovereignty): वर्तमान वैश्विक भू-राजनीति में सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, हरित ऊर्जा और रक्षा विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता हासिल करना अनिवार्य है। इसके लिए देश में घरेलू कॉर्पोरेट दिग्गजों का होना राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय बन चुका है।
संबंधित सरकारी पहलें और नीतियां
भारत सरकार ने देश में स्टार्ट-अप और विनिर्माण इकोसिस्टम को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं:
- स्टार्ट-अप इंडिया (Startup India - 2016): इस पहल के तहत करों में छूट, पेटेंट फाइलिंग में सहायता, स्व-प्रमाणीकरण (Self-Certification) और फंड ऑफ फंड्स (Fund of Funds) जैसी सुविधाएं प्रदान की गई हैं।
- डिजिटल इंडिया (Digital India): इसने देश के कोने-कोने में डिजिटल बुनियादी ढांचे को मजबूत किया है, जिससे कंपनियों को अखिल भारतीय बाजार तक पहुंच हासिल करने में मदद मिली है।
- उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना: घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने और भारतीय कंपनियों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए 14 प्रमुख क्षेत्रों में वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान किया जा रहा है।
- अटल नवाचार मिशन (AIM): इसका उद्देश्य स्कूलों और विश्वविद्यालयों में नवाचार और उद्यमिता के अनुकूल परितंत्र विकसित करना है।
- राष्ट्रीय डीप-टेक स्टार्ट-अप नीति (National Deep-Tech Startup Policy - विचाराधीन): यह नीति उन्नत प्रौद्योगिकियों (AI, रोबोटिक्स, बायोटेक) से जुड़े उद्यमों के लिए बुनियादी सुधारों और दीर्घकालिक धैर्यपूर्ण निवेश को लक्षित करती है।
आगे की राह: भारत के वैश्विक कॉर्पोरेट दिग्गजों का विकास
भारत को वर्ष 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनाने के लिए वर्तमान नीति संरचना में निम्नलिखित सुधार करने की आवश्यकता है:
- R&D निवेश में वृद्धि: सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के सहयोग से देश के कुल अनुसंधान एवं विकास (R&D) व्यय को जीडीपी के कम-से-कम 2 प्रतिशत तक ले जाना चाहिए। शैक्षणिक संस्थानों और निजी उद्योगों के बीच मजबूत सहयोग स्थापित करना आवश्यक है।
- डीप-टेक इकोसिस्टम का विकास: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सेमीकंडक्टर्स, क्वांटम कंप्यूटिंग, रक्षा प्रणालियों और उन्नत जैव-प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले व्यवसायों को दीर्घकालिक 'धैर्यपूर्ण वित्त' उपलब्ध कराना चाहिए।
- बौद्धिक संपदा (IP) व्यवस्था को मजबूत करना: देश में पेटेंट दाखिल करने, उनकी सुरक्षा करने और उनके व्यवसायीकरण (Monetisation) की प्रक्रिया को तेज व सरल बनाया जाए, ताकि हमारी कंपनियां वैश्विक मूल्य चक्र पर अधिकार कर सकें।
- व्यापारिक नियमों का सरलीकरण (Easing Compliance): नियमों और कानूनों को युक्तिसंगत बनाया जाए। विभिन्न राज्यों की नीतियों में एकरूपता (Standardisation) लाई जाए ताकि मध्यम स्तर के व्यवसायों को बड़ा होने में अतिरिक्त अनुपालन लागतों का सामना न करना पड़े।
- वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं (GVCs) में एकीकरण: भारतीय उद्योगों को केवल उत्पाद असेंबल करने की सीमित भूमिका से आगे बढ़कर वैश्विक स्तर पर उत्पादों के डिजाइन, ब्रांडिंग और बौद्धिक संपदा पर नियंत्रण की दिशा में आगे बढ़ना होगा।
- कॉर्पोरेट जगत के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण: समाज और नीति निर्माताओं को यह स्वीकार करना होगा कि प्रतिस्पर्धा और नवाचार के माध्यम से अर्जित किया जाने वाला लाभ देश के विकास, बड़े पैमाने पर रोजगार और सामाजिक कल्याण के लिए आवश्यक है।
परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य (Static GK & Facts)
- प्रथम भारतीय कंपनी (10B Profit): रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) 10 अरब डॉलर से अधिक का वार्षिक शुद्ध लाभ अर्जित करने वाली भारत की पहली कंपनी है।
- प्रथम FMCG (1 लाख करोड़ कारोबार): गुजरात सहकारी दुग्ध विपणन महासंघ (GCMMF - अमूल) भारत का पहला एफएमसीजी ब्रांड है जिसने 1 ट्रिलियन रुपये का कारोबार पार किया है।
- स्टार्ट-अप रैंकिंग (वैश्विक): भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्ट-अप इकोसिस्टम है (अमेरिका और चीन के बाद)।
- भारत का R&D व्यय: भारत अनुसंधान पर सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 0.64% व्यय करता है, जो अग्रणी देशों की तुलना में काफी कम है।
- प्रमुख नोडल विभाग: स्टार्ट-अप नीति को विनियमित करने और मान्यता प्रदान करने की जिम्मेदारी वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के तहत कार्य करने वाले 'उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग' (DPIIT) की है।
- राष्ट्रीय उद्यमिता दिवस: उद्यमिता और नवाचार को बढ़ावा देने के लिए प्रत्येक वर्ष 16 जनवरी को 'राष्ट्रीय स्टार्ट-अप दिवस' (National Startup Day) मनाया जाता है (इसकी शुरुआत वर्ष 2022 में की गई थी)।
मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न (Mains Practice Questions)
उत्तर का ढांचा:
- भूमिका / परिचय: हाल ही में रिलायंस ($10B प्रॉफिट) और अमूल (1 लाख करोड़ कारोबार) के कीर्तिमानों का उल्लेख करते हुए भारतीय कंपनियों के बड़े आकार और वैश्विक विनिर्माण में भारत की स्थिति पर टिप्पणी करें।
- मुख्य भाग:
- स्टार्ट-अप और यूनिकॉर्न की वर्तमान स्थिति: भारत में 1.6 लाख से अधिक मान्यता प्राप्त स्टार्ट-अप और 100 से अधिक यूनिकॉर्न विकसित हो चुके हैं (वैश्विक स्तर पर तीसरा स्थान)।
- स्केल-अप न होने के संरचनात्मक कारण: अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर कम खर्च (जीडीपी का <1%), केवल घरेलू बाजार पर निर्भरता, पेटेंट और बौद्धिक संपदा (IP) का अभाव, तथा दीर्घकालिक धैर्यपूर्ण पूंजी (Patient Capital) की भारी कमी।
- स्केल-अप के लाभ: विनिर्माण उत्पादकता में वृद्धि, बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन, सरकारी कर राजस्व में बढ़ोतरी, और रणनीतिक संप्रभुता (सेमीकंडक्टर/AI में आत्मनिर्भरता)।
- आगे की राह: R&D निवेश को बढ़ाकर जीडीपी का 2% करना, पेटेंट मंजूरी की प्रक्रिया को तेज करना, और विनिर्माण क्षेत्र के लिए राज्य स्तरीय नियमों का सरलीकरण।
- निष्कर्ष: केवल नए स्टार्ट-अप की संख्या बढ़ाने के बजाय वैश्विक पटल पर प्रतिस्पर्धा करने वाले बड़े कॉर्पोरेट दिग्गजों का निर्माण करें, जो विकसित भारत 2047 के संकल्प के लिए अनिवार्य है।
उत्तर का ढांचा:
अभ्यास प्रश्न (Practice Questions)
1उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत में स्टार्टअप इंडिया पहल के अंतर्गत वर्तमान में कितने से अधिक स्टार्ट-अप मान्यता प्राप्त हैं?
2रिलायंस इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड (RIL) वार्षिक शुद्ध लाभ में कौन-सा रिकॉर्ड बनाने वाली पहली भारतीय कंपनी बनी है?
3भारत की कौन-सी सहकारी समिति/कंपनी 1 लाख करोड़ रुपये (1 ट्रिलियन रुपये) का वार्षिक कारोबार पार करने वाली देश की पहली FMCG कंपनी बनी है?
4निम्नलिखित में से कौन-सा देश अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का सर्वाधिक प्रतिशत खर्च करता है?
5भारतीय स्टार्ट-अप परितंत्र (Startup Ecosystem) का विश्व स्तर पर कौन-सा स्थान है?
6स्टार्ट-अप शब्दावली में 'यूनिकॉर्न' (Unicorn) का क्या अर्थ है?
7उद्यमिता और नवाचार को बढ़ावा देने के लिए भारत में किस तिथि को 'राष्ट्रीय स्टार्ट-अप दिवस' मनाया जाता है?
8डीप-टेक (Deep-tech) स्टार्ट-अप्स के सामने आने वाली नियामक समस्याओं और वित्त की कमी को दूर करने के लिए कौन-सी नीति वर्तमान में विचाराधीन है?
9भारत का अनुसंधान एवं विकास (R&D) व्यय सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के कितने प्रतिशत के आसपास स्थिर है?
10निम्नलिखित में से कौन-सा क्षेत्र विनिर्माण को बढ़ावा देने वाली पीएलआई (PLI) योजना के तहत शामिल नहीं है?
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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